आरती रामायण जी की


रामायण आदिकवि महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित संस्कृत का एक अनुपम महाकाव्य है. इसमें 24000 श्लोक हैं. यह हिन्दू स्मृति का वह अंग हैं जिसके माध्यम से रघुवंश के राजा राम की गाथा कही गयी है. इसे आदिकाव्य या  वाल्मीकि रामायण भी कहा जाता है.

कालांतर में महान सन्त तुलसीदास जी ने पुनः मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम की पवित्र कथा को हिंदी भाषा में लिपिबद्ध किया. भगवान श्री राम की कल्याणकारी कथा से परिपूर्ण इस ग्रंथ का नाम रामचरितमानस रखा गया. इस ग्रन्थ में वर्णित रामकथा का मुख्य प्रयोजन एक आदर्श पुत्र, आदर्श पति, भ्राता एवं आदर्श राजा- एक वचन, एक पत्नी, एक बाण जैसे व्रतों का निष्ठापूर्वक पालन करने वाले राम का चरित्र उकेरकर अहिंसा, दया, अध्ययन, सुस्वभाव, इंद्रिय दमन, मनोनिग्रह जैसे षट्‍गुणों से युक्त आदर्श चरित्र की स्थापना करना रहा है. इस महान ग्रन्थ का नियमित पाठ एवं नियमित आरती से व्यक्ति इस भाव सागर के बंधन से मुक्त हो जाता है.

आरती रामायण जी की

आरती श्री रामायण जी की। कीरति कलित ललित सिया-पी की॥

शुक सनकादि शेष अरु शारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥

कीरति कलित ललित सिया-पी की॥

मुनि-मन धन सन्तन को सरबस। सार अंश सम्मत सबही की॥

कीरति कलित ललित सिया-पी की॥

व्यास आदि कविबर्ज बखानी। कागभुषुण्डि गरुड़ के ही की॥

कीरति कलित ललित सिया-पी की॥

दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब विधि तुलसी की॥

कीरति कलित ललित सिया-पी की॥

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