दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर मंदिर, उज्जैन


भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का मंदिर उज्जैन, मध्य प्रदेश में स्थित है। महाकाल को यहां का क्षेत्राधिपति माना गया है। उज्जैनवासी महाकाल को अपना राजा मानकर ही पूजन करते हैं। महाकालेश्वर मंदिर का इतिहास हजारों साल पुराना है।

भस्मारती की प्रथा

देश के द्वादश ज्योतिर्लिंग में सिर्फ महाकालेश्वर की ही भस्मारती होती है। प्रात: 4 से 6 बजे के मध्य वैदिक मंत्रों एवं स्त्रोत पाठ के साथ शिव का अभिषेक भस्म से किया जाता है। भस्म गाय के गोबर से बने कंडों द्वारा अखंड धूने में तैयार की जाती है। प्रतिदिन महाकाल के दर्शन करने यहां हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं। सावन माह में महाकालेश्वर के दर्शन करने का विशेष महत्व है। 

वर्ष में एक बार होते हैं नागचंद्रेश्वर के दर्शन

मंदिर के सबसे ऊपरी तल पर विराजित भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन हेतु वर्ष में सिर्फ एक ही बार द्वार खोले जाते हैं। श्रावण शुक्ल पंचमी को नाग के आसन पर स्थित शिव-पार्वती की सुंदर प्रतिमा के दर्शन लाखों श्रद्धालु वर्ष में एक बार करते हैं। यह प्रतिमा मराठाकालीन कला का उत्कृष्ट नमूना है।

कैसे पहुंचे-

उज्जैन पहुंचने के लिए देश के सभी बड़े शहरों से आवागमन के कई साधन उपलब्ध हैं। यहां रेल या बस द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। उज्जैन के पास ही इंदौर शहर है, जहां वायु मार्ग की सुविधा भी उपलब्ध है।

कब पहुंचें-

उज्जैन आने के लिए सभी मौसम श्रेष्ठ हैं। यहां किसी भी मौसम में महाकाल के दर्शन किए जा सकते हैं। हर वर्ष महाशिवरात्रि, सावन माह, सभी तीज-त्योहारों पर भक्तों की काफी भीड़ यहां लगी रहती है।
ठहरने की व्यवस्था- महाकाल मंदिर के आसपास कई होटल्स और धर्मशालाएं हैं, जहां ठहरने की उत्तम व्यवस्था है।

महाकाल मंदिर का इतिहास

महाकालेश्वर मंदिर के प्राप्त संदर्भों के अनुसार ई.पू. छठी सदी में उज्जैन के राजा चंडप्रद्योत ने महाकाल परिसर की व्यवस्था के लिए अपने पुत्र कुमार संभव को नियुक्त किया था। दसवीं सदी के अंतिम दशकों में संपूर्ण मालवा पर परमार राजाओं का आधिपत्य हो गया।

इस काल में रचित काव्य ग्रंथों में महाकाल मंदिर का सुंदर वर्णन आया है। 11वीं सदी के आठवें दशक में गजनी सेनापति द्वारा किए गए आघात के बाद 11वीं सदी के उत्तरार्ध व 12वीं सदी के पूर्वाद्र्ध में उदयादित्य एवं नरवर्मा के शासनकाल में मंदिर का पुनर्निमाण हुआ। 1235 में सुल्तान इल्तुमिश ने पुन: आक्रमण कर महाकालेश्वर मंदिर को ध्वस्त कर दिया किंतु मंदिर का धार्मिक महत्व बना रहा।

14 वीं व 15वीं सदी के ग्रंथों में महाकाल का उल्लेख मिलता है। 18वीं सदी के चौथे दशक में मराठा राजाओं का मालवा पर आधिपत्य हो गया। पेशवा बाजीराव प्रथम ने उज्जैन का प्रशासन अपने विश्वस्त सरदार राणोजी शिंदे को सौंपा। राणोजी के दिवान थे सुखटंकर रामचंद्र बाबा शैणवी। इन्होंने ही 18वीं सदी के चौथे-पांचवें दशक में मंदिर का पुन: निर्माण करवाया। वर्तमान में जो महाकाल मंदिर स्थित है उसका निर्माण राणोजी शिंदे ने ही करवाया है।

निश्चित ही यह धर्म-स्थल प्रागेतिहासिक देन है। वर्तमान में महाकाल ज्योतिर्लिंग, मंदिर के सबसे नीचे के भाग में प्रतिष्ठित है। मध्य के भाग में ओंकारेश्वर का शिवलिंग है तथा सबसे ऊपर वाले भाग पर साल में सिर्फ एक बार (नागपंचमी) खुलने वाला नागचंद्रेश्वर प्रतिष्ठिïत है। महाकाल का यह मंदिर भूमिज, चालुक्य एवं मराठा शैलियों का अद्भूत समन्वय है। मंदिर के 118 शिखरों को स्वर्ण मंडित किया गया है। जिससे महाकाल मंदिर का वैभव और अधिक बढ़ गया है।

कैसा है महाकाल का शिवलिंग
महाकालेश्वर का लिंग सभी ज्योतिर्लिंग में सबसे विशाल है। कलात्मक एवं नागवेष्टित रजत जलाधारी एवं गर्भगृह की छत का यंत्रयुक्त तांत्रिक रजत आवरण अत्यंत आकर्षक है दीवारों पर चारों ओर शिव की मनोहारी स्तुतियां अंकित है, गर्भगृह में नंदादीप सदैव प्रज्जवलित रहता है।

परिसर में स्थित अन्य मंदिर
महाकाल मंदिर का परिसर अत्यंत विशाल है। यहां करीब 40 अन्य मंदिर स्थापित है। जो पौराणिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इनमें से कुछ मंदिर दसवी सदी के हैं। 1. लक्ष्मी नृसिंह मंदिर, 2. रिद्धि-सिद्धि मंदिर, 3. श्रीराम दरबार मंदिर, 4. पंढरीनाथ मंदिर, 5. अवंतिका देवी, 6. चंद्रा दिव्येश्वर, 7. मंगलनाथ, 8. अन्नपूर्णा देवी, 9. वाच्छादन गणपति, 10. प्रवेश द्वार के गणेश, 11. नागचंद्रेश्वर, 12. रिद्धि-सिद्धि विनायक मंदिर, 13. साक्षी गोपाल, 14. संकट मोचन सिद्धदास हनुमान मंदिर, 15. स्वप्नेश्वर महादेव, 16. बृहस्पतेश्वर महादेव, 17. त्रिविश्टपेश्वर महादेव, 18. मां भद्रकाली मंदिर, 19. नवगृह मंदिर, 20. मारूति नंदन हनुमान, 21. वृक्ष त्रिवेणी, 22. श्रीराम मंदिर, 23. नीलकंठश्वेर, 24. प्राचीन नागबंध, 25. दक्षिणी मराठों का मंदिर, 26. गोविंदेश्वर महादेव, 27. सूर्यमुखी हनुमान, 28. लक्ष्मीप्रदाता मोढ़ गणेश मंदिर, 29. स्वर्णपालेश्वर महादेव, 30. शनि मंदिर, 31. कोटेश्वर महादेव, 32. सप्तऋषि मंदिर, 33. अनादिकल्पेश्वर मंदिर, 34. श्री बालविजय भक्त हनुमान, 35. ओंकारेश्वर महादेव, 36. वृद्धकालेश्वर महाकाल।

महाशिवरात्रि का पर्व

मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर में महाशिवरात्रि का पर्व श्रृद्धा व उल्लास से मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के बाबा महाकाल को दूल्हे की तरह सजाया जाता है। दूल्हे के रूप में सजे महाकाल का आकर्षक श्रृंगार देख श्रृद्धालु भी मोहित हो गए।

कैलाशचंद्र सोलंकी 70 साल से बना रहे हैं सेहरा
उज्जैन के मालीपुरा में रहने वाले कैलाशचंद्र सोलंकी का कहना है कि उनका परिवार पिछले लगभग 70 सालों से महाकाल का सेहरा बना रहा है। सोलंकी के दादा रणजीत कुंवरजी फूल वाले के समय से ये परंपरा चली आ रही है, जो आज भी कायम है। सोलंकी परिवार के लगभग 15 सदस्य 4 से 5 घंटे की अथक मेहनत के बाद महाकाल का सेहरा तैयार करते हैं। इन सदस्यों में महिलाएं, वृद्ध व बच्चे भी शामिल हैं। बाबा महाकाल का सेहरा बनाने में 50 हजार से अधिक की लागत आती है।

कैसे पहुंचें-
भोपाल-अहमदाबाद रेलवे लाइन पर स्थित उज्जैन एक पवित्र धार्मिक नगरी है। इंदौर से उज्जैन सिर्फ 55 किलोमीटर दूर है। प्रदेश के सभी प्रमुख शहरों से उज्जैन के लिए बसें आसानी से मिल जाती हैं। नजदीकी एयरपोर्ट भी इंदौर ही है।