Know About Nag Panchami in Hindi


नाग पंचमी

हिन्दू पंचांग के अनुसार नाग पंचमी का त्यौहार प्रतिवर्ष श्रावण मास (जुलाई-अगस्त ) के शुल्क पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है. वर्ष 2014 में 1 अगस्त को नाग पंचमी का त्यौहार मनाया जायेगा. नाग पंचमी हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है. यह श्रद्धा व विश्वास का पर्व है.

शास्त्रों के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता है. इसलिए इस दिन नागदेवता के साथ साथ भगवान शिव की भी पूजा होती है. हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार, नाग महर्षि कश्यप और उनकी पत्‍‌नी कद्रू की संतान हैं.
देवी मनसा को नागों की देवी माना गया है. इसलिये उत्तर भारत के अधिकांश भागों में नाग पंचमी के दिन मनसा देवी की भी पूजा की जाती है.

नाग पंचमी के उपवास की विधि

नाग पंचमी में व्रत उपवास करने से नाग देवता प्रसन्न होते है. इस व्रत में पूरे दिन उपवास रख कर सूर्यास्त के बाद नाग देवता की पूजा के लिये प्रसाद में खीर बनाई जाती है. खीर का भोग सबसे पहले नाग देवता अथवा भगवान शिव लगाया जाता है. इसके बाद इस खीर को प्रसाद के रुप में सभी लोग ग्रहण करते है. इस उपवास में नम व तली हुई चीजों को ग्रहण करना वर्जित माना जाता है. उपवास रखने वाले व्यक्ति को उपवास के नियमों का पालन करना चाहिए.

भारत के दक्षिण क्षेत्रों में श्रावण शुक्ल पक्ष की नाग पंचमी में शुद्ध तेल से स्नान किया जाता है. वहां अविवाहित कन्याएं इस दिन उपवास करती है. और मनोवांछित जीवनसाथी पाने की कामना करती है.

नाग पंचमी की पूजन विधि

नाग पंचमी के दिन उपवासक प्रातःकाल उठकर घर की सफाई एवं नित्यकर्म करके अपने घर की दहलीज के दोनों और गोबर या गेरू से पांच सिर वाले नाग देवता की आकृति बनाते है. कुछ जगहों पर दीवाल पर गेरू पोतकर पूजन का स्थान बनाते हैं फिर कच्चे दूध में कोयला घिसकर उससे गेरू पुती दीवाल पर घर जैसा बनाते हैं और उसमें अनेक नागदेवों की आकृति बनाते हैं।

उसके बाद स्नान कर साफ-स्वच्छ वस्त्र धारण करें. पूजन के लिए सेंवई-चावल आदि ताजा भोजन बनाएँ.
सर्वप्रथम नागों की बांबी में एक कटोरी दूध चढ़ा आते हैं। और फिर दीवाल पर बनाए गए नागदेवता की दूध, दूब, कुशा, गंध, अक्षत, पुष्प, जल, कच्चा दूध, रोली और चावल आदि से निम्नलिखित मंत्रोचार के साथ नाग देवता का पूजन कर सेंवई व मिष्ठान से उनका भोग लगाते हैं। तत्पश्चात निम्नलिखित कथा सुनकर आरती करते हैं|
मंत्र
ऊँ कुरुकुल्ये हुँ फट स्वाहा.
उपरोक्त मंत्र का जाप करने से ‘कालसर्प योग’ की शान्ति होती है.

नागपंचमी की कथा

एक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक सेठजी के सात पुत्र थे। सातों के विवाह हो चुके थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदूषी और सुशील महिला थी, परंतु उसके कोई भाई नहीं था। एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी डलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगी। तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी।

यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- बहिन! इसे 'मत मारो. इसका क्या अपराध है? यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा और सर्प एक ओर जा बैठा।

इस पर छोटी बहू ने सर्प से निवेदन किया कि 'हम अभी लौट कर आते हैं आप यहां से मत जाना. यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और घर पर कामकाज में फँसकर सर्प से किया गया वादा भूल गई।

छोटी बहू को जब दूसरे दिन यह बात याद आई तो वह सब को साथ लेकर पुनः वहाँ पहुँची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली- सर्प भैया नमस्कार!

सर्प ने कहा- 'तू भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, वरना तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता।

छोटी बहू बोली- भैया मुझसे भूल हो गई, मुझे क्षमा कर दो.

इसके बाद सर्प ने बोला- ठीक है, अच्छा, तो तू आज से मेरी बहन हुई और मैं तेरा भाई. बहिन तुझे जो मांगना हो, माँग लो.

छोटी बहू बोली- भैया! मेरे कोई भाई नहीं है, अच्छा हुआ कि जो तू मेरा भाई बन गया.

इसके बाद सेठजी की सभी बहुएं पुनः घर वापस आ गईं.

कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप धारण कर सेठजी के घर आया और बोला कि 'मेरी बहन को भेज दो।' यह सुनकर सेठ के घर के सभी लोग आश्चर्य में पड़ गए. सबने कहा कि 'इसके तो कोई भाई नहीं था, तू कहाँ से आ गया?

इसके बाद मनुष्य रूपी सांप ने बोला- मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूँ, बचपन में ही बाहर चला गया था।

उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी बहू को उसके साथ भेज दिया।

मनुष्य रूपी सांप ने रास्ते में सेठजी की छोटी बहू से बोला! हे बहिन! 'मैं वहीं सर्प हूँ, जो मिट्टी खोदते समय आप से मिला था. इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूछ पकड़ लेना।

छोटी बहू ने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह सांप के घर पहुंच गई और वहाँ के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई.

एक दिन की बात है कि सर्प की मां ने उससे कहा- कि 'मैं एक काम से बाहर जा रही हूँ, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना.

छोटी बहू ने बोला ठीक है. परन्तु छोटी बहू को यह बात ध्यान में न रही और उसे गर्म दूध पिला दिया, जिसके कारण उसका मुख बुरी तरह जल गया।

यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई। परंतु सर्प के समझाने पर चुप हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र-आभूषण आदि देकर उसके घर पहुँचा दिया।

इतना ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा- भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए। सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएँ सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने पुनः कहा- 'इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए'। तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी।

सर्प ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था। उसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- सेठ की छोटी बहू का हार यहाँ आना चाहिए।'

राजा ने मंत्री को आदेश दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र ही राजदरबार में उपस्थित हो.

मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि 'महारानी जी! छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो'। सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर दे दिया।

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की- भैया ! रानी ने मेरा हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए।

सर्प ने कहा –ठीक है बहिन. ऐसा ही होगा. जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी।

यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? 

सेठजी स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर राजदरबार में उपस्थित हुए।

राजा ने छोटी बहू से पूछा- तुमने यह क्या जादू किया है, मैं तुझे दण्ड दूंगा।

छोटी बहू बोली- राजन! क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है।

यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- अभी पहनकर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हीरों-मणियों का हो गया।

यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं।

छोटी बहू अपने हार सहित घर लौट आई।

उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है।

यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है? तब वह सर्प को याद करने लगी। तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा- यदि मेरी बहिन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे डस लूँगा।

यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन से नागपंचमी का त्यौहार मनाया जाता है और स्त्रियाँ सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं।

नाग पंचमी की विशेषताएं

 

हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार पंचमी तिथि के स्वामी नाग देवता है. श्रावण मास में नाग पंचमी होने के कारण इस मास में धरती खोदने का कार्य नहीं किया जाता है. श्रावण मास के विषय में यह मान्यता है कि इस माह में भूमि में हल चलाना और नींव खोदना वर्जित है. इस अवधि में भूमि के अंदर नाग देवता का विश्राम कर रहे होते है. भूमि के खोदने से नाग देव को कष्ट होने की संभावना रहती है.

नाग पंचमी में बासी भोजन ग्रहण करने का विधान

 

देश के कुछ भागों में ऐसी मान्यता है कि नाग पंचमी के दिन मात्र पूजा में प्रयोग होने वाला भोजन ही तैयार किया जाता है. बाकी भोजन एक दिन पहले ही बनाया जाता है. परिवार के जो सदस्य उपवास नहीं कर रहे हे. उन्हें बासी भोजन ही ग्रहण करने के लिये दिया जाता है. वैसे इस दिन लोग अपने घरों में खीर, चावल -सैवईयां ही बनाते हैं.

एक अन्य कथा

एक दूसरी कथा के अनुसार, किसी नगर में एक कृषक अपने परिवार सहित रहता था। उसके तीन बच्चे थे-दो लड़के और एक लड़की। एक दिन जब वह हल चला रहा था तो उसके हल के फल में बिंधकर सांप के तीन बच्चे मर गए। बच्चों के मर जाने पर मां नागिन विलाप करने लगी और फिर उसने अपने बच्चों को मारने वाले से बदला लेने का प्रण किया। एक रात्रि को जब किसान अपने बच्चों के साथ सो रहा था तो नागिन ने किसान, उसकी पत्नी और उसके दोनों पुत्रों को डस लिया। दूसरे दिन जब नागिन किसान की पुत्री की डसने आई तो उस कन्या ने डरकर नागिन के सामने दूध का कटोरा रख दिया और हाथ जोड़कर क्षमा मांगने लगी। उस दिन नागपंचमी थी। नागिन ने प्रसन्न होकर कन्या से वर मांगने को कहा। लड़की बोली-'मेरे माता-पिता और भाई जीवित हो जाएं और आज के दिन जो भी नागों की पूजा करे उसे नाग कभी न डसे। नागिन तथास्तु कहकर चली गई और किसान का परिवार जीवित हो गया। उस दिन से नागपंचमी को खेत में हल चलाना और साग काटना निषिद्ध हो गया।

नाग-पंचमी का एतिहासिक वर्णन

पुराणों के अनुसार, सूर्य के रथ में बारह सर्प (नाग) हैं, जो क्त्रमश: प्रत्येक माह में उनके रथ के वाहक बनते हैं। भगवान विष्णु क्षीर-सागर में शेषनाग की शय्या पर विश्राम करते हैं। शेषनाग ही रामावतार में लक्ष्मण और कृष्णावतार में बलराम के रूप में अवतरित हुए थे।

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा और सिंधु घाटी की सभ्यता के अवशेष साक्षी हैं कि नागों के पूजन की परंपरा आदिकाल से प्रचलित है। मिश्च की सभ्यता भी अत्यंत प्राचीन है। वहां आज भी शेख हरेदी नामक पर्व पर सांपों की पूजा की जाती है। पड़ोसी राष्ट्र नेपाल में नाग-पंचमी का उत्सव सपरें के त्योहार के रूप में मनाया जाता है। पर्वतीय प्रदेशों में नाग-पूजा का प्रचलन अधिक है। सुप्रसिद्ध संस्कृत कवि कल्हण ने राज तरंगिणी ग्रंथ में कश्मीर की धरती का दिव्य सपरें से संबंध बताया है। वहां अनंतनाग नामक स्थान उसका ऐतिहासिक साक्ष्य है।

मान्यता है कि नाग-पंचमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कालिय-मर्दन लीला हुई थी। भविष्य पुराण में कथानक है कि देवासुर-संग्राम में हुए समुद्र-मंथन से उच्चैश्रवा नामक अश्व (घोड़ा) निकला था। उसे देखकर नागमाता कद्रू ने अपनी सौत विनता से कहा, इस घोड़े का सफेद रंग है, परंतु बाल काले दिखलाई पड़ते हैं। विनता द्वारा यह बात स्वीकार न किए जाने पर दोनों में वाद-विवाद छिड़ गया। कद्रू ने नागों से अश्व के बाल के समान सूक्ष्म होकर उच्चैश्रवा के शरीर पर लिपट जाने को कहा, ताकि वह काले रंग का दिखाई देने लगे। पुत्र नागों द्वारा विरोध करने पर कद्रू ने क्त्रोधित होकर उन्हें राजा जनमेजय द्वारा किए जाने वाले सर्प-यज्ञ के दौरान भस्म हो जाने का शाप दे दिया। तब ब्रह्माजी के वरदान से आस्तीक मुनि ने सर्प-यज्ञ को रोककर नागों की प्राणरक्षा की। मान्यता है कि ब्रह्माजी द्वारा पंचमी के दिन वरदान दिए जाने और पंचमी के दिन ही आस्तीक मुनि द्वारा नागों की रक्षा किए जाने के कारण पंचमी-तिथि नागों को समर्पित है।

नाग-पंचमी पर मुख्यत: पांच पौराणिक नागों की पूजा होती है - अनंत, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक व पिंगल। असंख्य फन वाले अनंत (शेष) नाग की शय्या पर भगवान विष्णु विश्राम करते हैं। वासुकि नाग को मंदराचल से लपेटकर समुद्र-मंथन हुआ था। तक्षक के डसने से राजा परीक्षित की मृत्यु हो गई। नागवंशी कर्कोटक के छल से रुष्ट होकर नारदजी ने उसे शाप दिया था। तब राजा नल ने उसके प्राणों की रक्षा की थी। हिंदू व बौद्ध साहित्य में पिंगल को कलिंग में छिपे खजाने का संरक्षक माना गया है।

अंधविश्वास के चलते लोग नाग-पंचमी के दिन सांपों को दूध पिलाते हैं। यह गलत है। सांप स्वभावत: दूध नहीं पीते। सांपों को दूध पिलाने के प्रलोभन में सपेरे कई दिन पहले उनका भोजन-पानी बंद कर देते हैं। अत: भूख-प्यास शांत करने के लिए सांप नाग-पंचमी को दिया जाने वाला दूध ग्रहण तो कर लेते हैं, किंतु उसका पाचन न होने से अथवा एलर्जी के कारण उनकी मृत्यु होने की आशंका रहती है।